विश्लेषण: चुस्की नाटक की – बाइंडर

Note: For my English reader, pardon me for posting the article in the Hindi language as the play (I am reviewing) is in Hindi. It would make more sense to give the review in the same language. Tomorrow onward, the blog will be written in English.

मुझे बहुत हैरानी होती है अगर किसी कला प्रस्तुति के तुरंत बाद उसकी चर्चा नहीं होती; चाहे वो नाटक मंचन हो, चित्र प्रदर्शनी हो या फिल्म की प्रस्तुति हो। कला अच्छी लग सकती है, बुरी लग सकती है, परउसकी चर्चा जरूर होनी चाहिए!

इस मंगलवार (नवंबर २७) सांय ७:३० बजे, मैंने एक बहुत ही उम्दा नाटक देखा। नाम था –

चुस्की नाटक की – बाइंडर

प्रसिद्द नाटककार विजय तेंदुलकर के लोकप्रिय नाट्य लेखनी सखाराम बाइंडर पर आधारित इस नाटक को प्रस्तुत किया था बैंगलोरके नामी नाट्य मंडली – थिएटर ऑन योर ओन (Theatre On Your Own). इस नाटक की ये २८वीं प्रस्तुति थी और इसे निर्देशित किया सरबजीत दास ने।

कहानी

कहानी का ताना-बाना एक बुक बाइंडरके इर्द-गिर्द बुना गया है जिसका नाम है सखाराम। सखाराम वैसे तो ब्राह्मण है पर किसी धर्म या कानून को नहीं मानता। वो खुद की जुबान को ही पत्थर की लकीर समझता है और दूसरों को मानने के बाध्य करता है। वो आज़ादी-पसंद और शरीर के तमाम जरूरतों से ग्रसित, उन औरतों को अपने घर में पनाह देता है जो समाज का द्वारा शारीरिक अथवा मानसिक रूप से  पीड़ित हैं।  उसे वह रोटी, कपडा और रहने को छत जरूर देता है पर बदले में उनसे अपेक्षा रखता है कि वह उसकी सेवा-सुश्रुषा तन और मन से करे।

विश्लेषण

ये नाटक जहाँ एक ओर पुरुष-प्रधान समाज के विकृत मनोधारणा को दर्शाती है और दूसरी ओर औरत के दयनीय दर्जे को बड़ी अच्छी तरह से उभारती है। इस जटिल विषय को सही एवं सरल तरीके से प्रस्तुत करने के लिए निर्देशक का मंच को दो भागों में विभाजित करने का प्रयोग सफल रहा है। एक भाग में कलाकारों के बीच की गतिविधि और दूसरे भाग में उन कलाकारों के बीच के संवादों को किसी दूसरे कलाकारों के द्वारा बुलवाया गया। इसके अलावा, मंच पर विभिन्न प्रकार रोशनी, लाइव संगीत एवं रचनात्मक चित्रों के प्रयोग ने इस नाटक को एक नयी ऊंचाई दी; संभवतः दर्शकों को २ घंटे बांधने में सारे तकनीकी विभाग काफी योगदान रहा है। पहले ही पड़ाव से जब एक गतिशील संगीत के साथ मंच पर प्रकाश पड़ता है मैं पूरी तरह से अपने बाकी सारे काम भूल चुका था!

सभी कलाकार अपने किरदारों में इतने जीवंत थे कि पूरा मंच सजीव हो उठता है। ऐसे में अगर कहानी का मूल निर्देश आपको नैतिकता पाठ न पढ़ाकर अगर सच्चाई से रू-ब-रू करना हो तो आप किरदारों ने मनः स्थिति को महसूस कर पाते हैं। इस नाटक ने ऐसा ही अद्भुत काम कर दिखाया। अवश्य इसके सारे चित्र में मेरे मन काफी दिनों तक नाचते रहेंगे!

हालाँकि, कुछ दो-चार समन्वयिता से सम्बंधित तुच्छ त्रुटियां थी पर वो सभी कलाकारों के बेहतरीन अभिनय एवं आपसी सामंजस्य में कहीं छुप-सी जाती हैं! मुझे नाटक की लगभग २ घंटे की अवधि का पता तो नहीं चला, पर इस लम्बाई को थोड़ा काम किया जा सकता है। और बीच में बस कहीं-कहीं कुछ दृश्यों में किरदारों के भावों को अधिक उभारने के लिए संगीत का थोड़ा और उपयोग हो सकता है।

अंततः इस नाटक का अनुभव मेरे लिए इतना खास रहा है कि मुझे विजय तेंदुलकर जी के अन्य नाटक (जैसे, खामोश! अदालत जारी है) पढ़ने तीव्र इच्छा हुई और शायद, जल्द ही मैं पढ़ना चालू भी करूँगा! मेरी तरफ से सरबजीत और थिएटर ऑन योर ओन (Theatre On Your Own) की पूरी टीम को ढेर सारी बधाइयाँ एवं भविष्य के लिए बहुत-बहुत सारी शुभकामनाएं! आशा है आपलोग ऐसे प्रयोगात्मकऔर सामजिक नाटकों को मंचन करते रहेंगे।

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