The Edge of Heaven – एक विश्लेषण

Every time I go to watch a play in an auditorium then while waiting I spot some people (who may or may not be from theatre) making small talks in an unusual voice with so much love and it looks fake; you know because of its extremity. Okay, I forgot I am reviewing this play in Hindi.

मैं कई बार किसी भी नाटक के शुरू होने से पहले बाहर कुछ लोगों को हमेशा एक-दूसरे से बहुत अजीब तरीके से गपशप करते सुनता हूँ। उन बातों में न भाव होता है, न तथ्य। बहुत सारा, बहुत ही सारा प्यार दिखाया जाता है जिसकी ध्वनि जरूरत से ज्यादा ही तेज होती है। नाटक वहीं से शुरू हो जाता है।

लेकिन ये नाटक वैसा नहीं है! इसमें प्यार है जो मासूमियत को ढूँढता है, उन्मुक्तता को महसूस कराता है, लड़कपन में खोया होता है। दो रोशनी की बिंब चमचमाती है और नाचती है संगीत के धम पर और कहानी के दरवाज़े खुलते है, एक-एक कर। इसके धीमे स्वभाव और मधुर धुनों के ताल में कुछ ऐसे रसायन की खुश्बू है कि आप अपने-आप ही उस दरवाज़े से इस कहानी के किरदार बन जाते हैं।

किरदारों से याद आया – वो किरदार ही थे जो आपको वो सब महसूस करा रहे थे जो वो महसूस कर रहे थे। और यही तो चाहिए न, किसी भी नाटक को अपने रोओं में महसूस करने के लिए?
हालांकि, सिर्फ किरदार ही नहीं, कुछ और लोग थे इस नाटक को बेहतरीन बनाने के लिए।

नेपथ्य (यहाँ वैसे बगल में ही था) में बजता बहुत ही मुल्यांकित और प्रभावशाली संगीत जो ख्वाब को ख्वाब, जन्नत को जन्नत और ईरान की सूखी हवा को आप तक लेकर आती है। पर कहती नहीं है, बस आ जाती है चुपके से क्योंकि खामोशी भी बात कर सकती है न!

इन सबमें लाइट अपनी छाप छोड़ना नहीं भूलता। इस नाटक के किसी भी दृश्य को रोक कर अगर कोई देखें तो हर तस्वीर को घर की दीवारों पर फ्रेम कर लगाया जा सकता है।

शिकायतें बहुत ज्यादा नहीं है – बस ये कि नाटक थोड़ा-सा छोटा हो सकता है। और कहीं-कहीं (महज़ 3-4 जगह) आवाज़ कम थी। बस….

अंत में, Edge of Heaven यहाँ की कहानी न होते हुए भी आपको ये यकीन दिलाती है कि ये यहीं कहीं से निकाली गयी है। दर्शकों को साँस लेने की फुर्सत देती है ताकि आप पूरी तरह से इसके हो जाएं और ये आपकी।

ये नाटक सभी लोगों को देखना चाहिए। इसमें वो क्षमता है जो आपको बार-बार नाटक की दुनिया में, या तो प्रशंसक की तरह और या फिर कलाकार के रूप में, आने के लिए मजबूर करेगा

एक आख़िरी सवाल – हिंदी में लिखे इस नाटक का नाम अंग्रेजी में क्यों है? जन्नत का किनारा जैसा नाम भी रखा जा सकता था!

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