थप्पड़ – एक विश्लेषण

थप्पड़ फिल्म को देखने के तुरंत बाद आपकी आँखें आपको कोमल और खूबसूरत लगने लगेंगी; क्योंकि तब तक आपके नयन पुरुषत्व के आँसुओं से भीगकर सूख चुके होंगे; बशर्ते आप पुरुष होने के अभिमान में अंधे न हुए हों तो।

इस फिल्म में आत्मीयता है जो हमारे पुरुष-प्रधान समाज में स्त्रियों के खिलाफ गूढ़े गए पक्षपात पर प्रकाश डालता है बिना किसी बड़े महिला जागरूकता अभियान के, शांति से, धीरे-धीरे परत-दर-परत खोलते हुए। ये सभी पुरुषों को नीचा नहीं दिखाती। और ये काम संजीदगी से करना बहुत कठिन था पर दो लेखकों (अनुभव सिन्हा एवं मृण्मयी लागू) की वजह से ये कहानी वैसा संतुलन बनाने में कामयाब रहती है। इस फिल्म को अति-स्त्रीवाद (Extreme-Feminism) के लेंस से देखा जाना अतिश्योक्ति होगी!

जब एक हत्या होती है तब सब परेशान होते हैं, चिल्लाते हैं और नारे लगते हैं। पर जब वही हत्या बार-बार और रोज होती है तब कान, आँख और दिमाग भी शांत रहते हैं; क्योंकि हम उस घटना के आदि हो चुके होते हैं। स्त्रियों को नीचा मानना हत्या जैसा जघन्य तो नहीं है पर रोज-रोज ये प्रताड़ना दैनिक जीवन का हिस्सा बन हत्या में ही बदल जाती है, वही हत्या जिसमें औरत ये मानने लगती है कि “थोड़ा-बहुत सहना पड़ता है”। फिल्म में रत्ना पाठक शाह जी और तन्वी आज़मी जी का किरदार कुछ ऐसा ही है जिनकी सोच धीरे-धीरे ग्लानि में बदलने लगती है।

कहने की जरुरत नहीं है पर सारे अभिनेता और अभिनेत्रियों ने बहुत अच्छा काम किया है – तापसी पन्नू, रत्ना जी, तन्वी आज़मी जी, कुमुद मिश्रा, मानव कौल, दिया मिर्ज़ा, माया सराव, पवैल गुलाटी और गीतिका विद्या। ये कहानी सिर्फ अमृता की नहीं है। उसके आस-पास के सारे किरदारों की कहानी है और फिल्म उन सारे किरदारों को उभरने का मौका देता है। गीतिका विद्या और कुमुद मिश्रा का तारीफों की फेहरिस्त में अलग-से नाम लेना बहुत जरूरी है। माया सराव और करन राठी ने हालाँकि अपना काम बखूबी किया है पर उन्हें अपने अभिनय में थोड़ा और वक़्त देना होगा!

हाल ही में हुए एक साक्षात्कार में अनुभव सिन्हा ने कहा था कि पहले नब्बे के दशक में वो मुख्य छायाकार को कैमरा रखने तक का स्थान बताने की कोशिश करते थे जोकि अब बदल चुका है। वो अब अपने तकनीकी लोगों को सिर्फ अपना आईडिया बताते है और उनसे अपेक्षा रखते हैं कि वो उन्हें सही सलाह देंगे। मेरे विचार से, इसी वजह से उनकी दूसरी पारी की फिल्में हर रूप से सुदृढ़ लग रही हैं। फिल्म थप्पड़ उस सूची में अव्वल नंबर पर है। फिल्म का हरेक चित्र, एडिटिंग, बैकग्राउंड संगीत और खासकर, प्रोडक्शन काफी सोच-विचार कर चुना गया है।

ये फिल्म सभी पुरुषों को उनके जीवन में मौजूद किसी भी महिला (माँ, बहन, चाची, मौसी, दादी, पत्नी या मित्र) के साथ देखनी चाहिए और सभी लड़कियों या महिलाओं को अपने जीवन मौजूद किसी भी लड़के या पुरुष (पिता, नाना, दादा, चाचा, मामा, भाई, पति या दोस्त) को दिखाना चाहिए।

अंत में, सवाल ये नहीं है कि आपने औरतों को अपने से कभी नीचा नहीं समझा। आपको गर्व तब होना चाहिए जब आप किसी पौरुष गुरूर से ग्रस्त आदमी को देख पाते हों और उसके खिलाफ खड़े भी होते हैं।

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