रामप्रसाद की तेहरवी – एक समीक्षा

“क्या रोने वाली मूवी ले के आ गए यार!”

फिल्म देखने के बाद जब मैं लिफ्ट से नीचे जा रहा था, मुझे पीछे से एक लड़की की आवाज़ सुनाई दी। वो अपनी दोस्त से शिकायत कर रही थी। मैं मुस्कुरा दिया और लिफ्ट खुलते ही exit गेट से बाहर चला गया।
घर पहुँचते ही मैंने कुछ review पढ़े तो किसी critic ने लिखा था

To treat a film like a play comes across as a disservice to both the mediums.

I was in disagreement and a thought lingered in my mind,

“Does this critic actually understand or has even experienced theatre medium?”

But I immediately took a step back on this thought and clicked the link to read what he actually meant. Surprisingly, the review never explained why – it says cinematography and editing are generic but never tells why or how. That makes me wonder – does this person even understand cinema medium? In fact, the review is talking about the plot a lot. That reminds me to inform all of you – Do not read that review before watching the film. It contains spoilers.

After reading the review, I felt that I need to write blogs on how to watch a film or a play and how to review them.

Moving on.

रामप्रसाद की तेहरवी छोटे शहरों के बड़े-बड़े पर मध्यम-वर्गीय परिवार की खुशबू लेकर आपके आस-पास छिड़क देती है। कहानी बस इतनी-सी है:

रामप्रसाद की अकस्मात मृत्यु के बाद उनकी शोक-सभा के लिए उनके चार बेटे – बहुएं, एक बेटी, पोते-पोती, साले और उनकी पत्नी एवं समस्त मुहल्ले के लोग आते हैं। कहानी इसी 13 दिनों की है।

पिछले कुछ सालों से हिंदी सिनेमा में यूपी बिहार के पृष्ठभूमि पर कुछ अतरंगी कहानी को दिखाया गया पर कॉमेडी का बीन बजाने में इन प्रदेशों की मौलिकता अक्सर बोलने के तरीके और शब्दों पर ही सीमित रह जाती है। रामप्रसाद की तेहरवी इससे ऊपर उठकर चरित्रों के आंतरिक विचार और उनके सामाजिक, पारिवारिक और व्यक्तिगत संघर्ष के अनुसार उन्हें कहने, सुनने और करने की आज़ादी देती है। इसी वजह से लगभग सारे किरदार अलग-से दिखाई देते हैं। ये फिल्म जबरदस्ती हँसाने की कोशिश नहीं करती बल्कि सीन के दौरान जैसा भाव उत्पन्न होता है वैसा परोस देती है। कहानी अंत में भी किसी एक भारी-भरकम निष्कर्ष पर न पहुँचते हुए किरदारों के अलग होने के साथ ही बाय-बाय कर देती है।

फिल्म की cinematography बहुत ही अद्वितीय नहीं है पर फिल्म की कहानी और उनके जगह के हिसाब से न्याय करती है। हालांकि, बाहर के location की cinematography में रचनात्मकता की थोड़ी कमी है। कुछ long shots कलाकारों की blocking के साथ काफी अच्छे लिए गए हैं। Editing कहानी को आगे बढ़ाने का काम बख़ूबी करती है पर flashback वाले दृश्यों को और सही से सम्भाला जा सकता था।

अगर आप अपने जीवन में इतने उलझ गए हैं कि अपने अगल-बगल की कहानियाँ देखने का समय नहीं मिलता तो रामप्रसाद की तेहरवी आपको उन्हीं में से एक कहानी को छूने का अवसर देती है। थोड़ी गुदगुदाहट और थोड़ी भावुकता के साथ आपको फिर से अपनी ज़िन्दगी में वापस लौट जाने को कहती है।

जाइए और देखिए।

PS: I haven’t taken any names of actors, director or writer but all of them are from theatre fraternity and it is totally worth watching them.

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