कितना कुछ किया जा सकता था “दो कौड़ी के खेल में”

अगर ये इस नाटक का पहला मंचन होता तो इस समीक्षा का शीर्षक होता – कितना कुछ किया जा सकता है “दो कौड़ी के खेल में”, पर जैसा मुझे पता चला ये नाटक तेरहवी बार खेला गया है।

ये काफी कठिन नाटक है – लिखना (शायद, Devised हुआ हो सकता है), निर्देशन और अभिनय तीनों क्षेत्रों के परिपेक्ष्य से। और इस नाटक से जुड़े सभी लोगों ने काफी मेहनत की है वो दिखता है – इसके लिए पूरी टीम की सराहना करनी होगी।

ये नाटक Bertolt Brecht के “The Three Penny Opera” का हिंदी अनुरूपण है और म्यूजिकल कॉमेडी की शक्ल में पूरे दो घंटे तक आपका मनोरंजन कर सकती है।

कहानी इतनी सरल नहीं है पर एक लाइन में बिना कुछ बड़ा खुलासा किये हुए यही बता सकता हूँ – एक साहूकार और डाकू कैसे सिस्टम की खामियों का फायदा उठा कर अपना उल्लू सीधा कर रहे हैं और हो जाते हैं दोनों आमने-सामने।

मैं जब नाटक देखकर बहार आया तो मैंने एक सज्जन से पूछा कि उन्हें नाटक कैसा लगा। उन्होंने कहा “मेरे लिए थोड़ा लम्बा हो गया” फिर मैंने सोचा कि कोई भी नाटक हमें काफी लम्बा क्यों लग सकता है? कई कारणों में सबसे बड़ी वजह होती है “मुझे इस नाटक में मज़ा नहीं आया” – ये मेरा कहना है, उन सज्जन का नहीं। हाँ, मैं इस नाटक को enjoy नहीं कर पाया।

इस नाटक की खामियों की तरफ मुख उठाने से पहले इसके अच्छे पहलू की तरफ देखते हैं क्योंकि वहीं से इसकी खामियाँ ज्यादा आसानी से समझ आ सकती है।

नाटक के पहले तीन कलाकार जिनको मैं Three Musketeers बोलना चाहूँगा का काम सराहनीय रहा है। उनके जिम्मे था गाने-बजाने में बढ़िया Chorus देना, 2-4 बार खुद भी गाना, ताबड़तोड़ संवाद (जोकि ज्यादातर जगह तुकबंदी में है), Choreographed physical movement (जिसमें slapstick को भी मैं शामिल कर रहा हूँ)। इन्होंने ज्यादातर भाग अच्छा किया है बस तीनों में और ज्यादा co-ordination चाहिए। यहाँ तक कि physical agility को बढ़ाना होगा slapstick और coordinated movement के लिए।

कलाकारों का ख़ुद गाना कुछ फ़िल्मी धुनों की तर्ज पर

ये बहुत बेहतरीन तरीका है दर्शकों को एक मिनट में आकर्षित करने का। अगर कलाकार मंच पर खुद गा रहे हैं, गाने वाला गायक सुरीला हो या न हो पर उसकी आवाज़ हमारे ह्रदय में लगनी चाहिए और कोरस ठहर के उस आवाज़ को ऊँचा उठाये। इस नाटक में कोरस ह्रदय पर लग रही थी और गायक की आवाज़ दब रही थी। चूंकि ये म्यूजिकल नाटक है इसलिए गायकों की गायकी लय में होनी चाहिए जो कई जगह नीचे जा रही है।

संगीत की जुगलबंदी

गाने की बात हो ही रही है तो संगीत की बात कर लेते हैं। पूरे खेल में संगीत 2 रूपों में मौजूद रहा है – पार्श्व संगीत और पार्श्व गायक के लिए संगीत। कीबोर्ड और ढोलक का मिश्रण अच्छा है पर देसी माहौल में विभिन्नता देने के लिए और भी यंत्रों का उपयोग हो सकता है, हालाँकि बीच-बीच में मिटटी के बर्तनों का इस्तेमाल काफी अच्छा हुआ है। संवाद वाले सीन के दौरान बैकग्राउंड म्यूजिक (छोटी-सी की कीबोर्ड पर एक Key बज रही होती है, पता नहीं किस उद्देश्य से) का इस्तेमाल ज्यादा चिड़चिड़ाहट पैदा करता है क्योंकि संवाद फर्राटे की तरह भाग रहे होते हैं।

ताबड़तोड़ संवाद

कई संवाद तुकबंदी में बोले जा रहे हैं जो काफी साहसी कदम है। लेकिन हर संवाद को पंचलाइन की तरह या हास्यात्मक बनाने की भरपूर कोशिश लग रही है जो एक समय के बाद बोझिल लगने लगता है। यहाँ एक और पहलू आता है – संवादों को कौन-सा किरदार और कैसे बोल रहा है?

किरदार Characterization

एक नाटक के किरदार चाहे कितना भी लाउड एक्टिंग (ये इस नाटक की डिमांड थी) कर रहे हों और बेवकूफी वाली हरकतें कर रहे हों, पर वो किरदार तब तक मनोरंजक नहीं बन सकते जब तक उनमें गहराई नहीं दी गयी हो। मुझे बस एक किरदार थोड़ा गहराई वाला लगा वो था मौसी उर्फ़ सास का किरदार जिसमें वो conviction दिखता है। बाकी कोई भी किरदार बिल्कुल अलग नहीं दिखता न ही संवाद बोलने में, न ही एक खास आदत के मामले में। हाँ, साहूकार किरदार की चाल कुछ देर के लिए उसे अलग बनाती है।

मूवमेंट, slapstick और साइड स्टेज का इस्तेमाल

Movement, जिसमें मैं नृत्य को भी जोड़ रहा हूँ, अच्छी तरह से उपयोग में लाया गया है पर इन सबमें बहुत अभ्यास की जरुरत है। हालाँकि, इस शो से पहले रिहर्सल का समय काफी कम था। ये अपने-आप ठीक हो जायेगा।

The three musketeers ने slapstick कॉमेडी के बहुत सारे अवसर गँवा दिए हैं। और जैसा मैंने पहले कहा agility और ज्यादा चाहिए। जो 3-4 humanoid बने वो सीन के हिसाब से सही हैं।

संगीतकारों के ठीक सामने एक मंच सजाया गया था जहाँ किरदार जो मंच पर नहीं होंगे बैठे हुए थे। इस तरह की सज्जा पहले मैंने अतुल कुमार जी की बेहतरीन नाट्य-नौटंकी बहरूपिया में देखी है। इस साइड स्टेज का इस्तेमाल कभी हुआ, कभी नहीं हुआ which is a missed-opportunity of wall-breaking in a much more creative way.

इन सारी कमियों की वजह से शायद इसीलिए ये नाटक हास्य-व्यंग्य होते-होते रह गया। नाटक कोशिश जरूर करती है एक मोनोलॉग के जरिये सिस्टम के बारे बताने की, पर वो कहीं भी हमारी अंतर-आत्मा को झकझोरता ही नहीं है।

ख़ैर, मुझे नहीं पता कि इस समीक्षा को गंभीरता से लिया जायेगा या नहीं। अगर लिया गया तो मेरे विचार से अगले मंचन में यह बहुत अलग ही जलवे बिखेरेगा।

देखते हैं।

PS1: I have a detailed view of all the things I’ve said. So, I am open to discussion if anyone feels like it.

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