थोड़ा है थोड़ा बाकी – “जिन्हें नाज़ है” समीक्षा

आज सुबह की कॉफ़ी पीते वक़्त एक आदमी अचानक मेरे सामने मोपेड रोकता है और मेरी तरफ देखकर मुस्कुराने लगता है। हेलमेट की वजह से पहचानने में १-२ सेकंड ज्यादा लग गए, वह यहीं पास की सड़क पर समोसे (कचौरी, नमकीन, जलेबी) की छोटी-सी टपरी चलाता है। पिछले लॉकडाउन के बाद जो पहला अनलॉक हुआ था मैंने उसकी दुकान ढूँढी जो मिली नहीं। मुझे डर था कि कहीं उसकी हालत भी देश के सारे पलायन किये हुए मजदूरों जैसी हो गयी होगी। मेरे पास उसका नंबर नहीं था। और अगर नंबर होता भी, तो शायद बात नहीं करता, क्योंकि हमदोनों के बीच दुकान में खड़े-खड़े भी कभी २-४ शब्दों की ही बातचीत नहीं हुई। वो मुझे ग्राहक के तौर पर पहचान भी जायेगा – ऐसा भ्रम नहीं था मुझे। हालाँकि, २ महीने के बाद ही उसकी टपरी वापस खुल चुकी थी। बात होने पर पता चला कि उसे उतनी समस्या नहीं हुई, वो घर पर दूसरे लोगों की अपेक्षा आराम से था। और हाँ, वह मुझे नाम से तो नहीं, पर चेहरे से पहचानता है। नाम से तो आज भी हमदोनों एक-दूसरे को नहीं जानते।

आज वह मुझे बोल गया कि वह फिर से घर गया था, अब दुकान वापस खुल चुकी है। दुकान का नाम गुलाब समोसा, जगह – बी टी एम लेआउट (BTM Layout)

कहा जाता है रंगमंच वास्तविकता के काफी करीब होती है और जब हम उसे देखते हैं तब हमें रत्ती भर का भी भ्रम नहीं होता कि यह कहानियाँ सच्ची नहीं हो सकती है। ज़मीन से जुड़ी इन कहानियों में होती है उमंग, कुंठा, लाचारी और अजीब सपने होते हैं जिनपर हमें हैरानी होती है, गुस्सा आता है, घिन्न आती है और रुंध जाता है गला।

ऐसी ही कहानियाँ जिन्हें नाज़ है नाटक में सुनाई गई है कुछ किरदारों के जरिए जो हमारे आस-पास हमेशा रहे हैं पर कभी दिखाई नहीं दिए या हमने देखने की ज़हमत नहीं उठाई। पिछले लॉकडाउन में ये किरदार हमें ख़बरों, गलियों-सड़कों और घर की रसोई में दिखाई देने लग गए थे।

जिन्हें नाज़ है नाटक दो नाटिकाओं का संकलन है – राशन और नमक – दोनों कहानियाँ एक तरह से एकालाप (monologue) है पर लाइट, बॉडी मूवमेंट एवं पार्श्व संगीत के प्रयोग से इसे सुसज्जित किया गया है।

नाटक लॉकडाउन में उभर कर आयी कहानियों को  सच्चाई से दिखाने में तो समर्थ रहा पर दर्शकों के दिलों पर सही तरह से चोट नहीं कर पाया।

इसके प्रमुखतः दो कारण रहे हैं –

1) राशन नाटिका वैसे तो स्थिरता के साथ अपनी कहानी कह पा रही होती है पर उसकी लेखनी में गहरे परत का अभाव है – जैसे एक थोड़ी-सी हैरानी या किरदार का कहानी सुनने वालों से मुँह फेर लेना या कुछ ऐसा बोल देना जो एक आम मध्यमवर्गीय और उच्चवर्गीय लोगों के सोचने के दायरे बाहर हो।

ऐसा इसलिए कह रहा हूँ क्योंकि दूसरी नाटिका नमक इस मामले में पूरी तरह से खरी उतरी है। उस कहानी के किरदारों के तीसरे-चौथे वाक्यों में अचंभा-सा महसूस होता है – उनके सपने सुनकर, उनके सोचने के तरीके को सुनकर और उनके हठ एवं नादानियों को देखकर। पर, इस नाटिका में तीन रोचक किरदार और मूवमेंट एवं डायनामिक ब्लॉकिंग होने के बावजूद कहानी शिथिल-सी महसूस होती है। दर्शक उन तीनों किरदारों से अच्छी तरह से जुड़ नहीं पाते। इसकी वजह है –

2) मूवमेंट का जरूरत से ज्यादा होना (पूरी 30+ मिनट की नाटिका में मुश्किल से 4-5 बार कलाकार स्थिर हो पाए हैं) जिससे संवादों का ओवरलैप होना, किसी संजीदा पल का उभर कर न आ पाना जैसी दिक्कतें आयी हैं।

चारों कलाकारों ने अच्छा अभिनय किया है और साथ ही, लाइटिंग ने चरित्र और कहानी के पड़ावों को अलग रूप देने की अच्छी कोशिश की है। हालांकि, अंधेरे से थोड़ा और खेला जा सकता है। राशन के अभिनेता और नमक की माँ की भूमिका निभाने वाली अदाकारा ने अपने गूढ़ अभिनय के जरिए अपनी छाप छोड़ी है। खासकर, राशन के अभिनेता का अपने पत्नी की चूड़ियों की खनक से बात करना और कहानी सुनाते वक़्त अपने-आप में ग़ुम हो जाना।

नमक के बाकी दो कलाकार, उनके अच्छे समन्वय (coordination) एवं भावपूर्णता (emotion & expression) के बावजूद, मूवमेंट के बहाव में थोड़े भागते हुए-से ज्यादा नज़र आते हैं।

राशन में पीछे से टीवी में चल रहे किसी चलचित्र और पत्नी की बस केवल परछाई ने माहौल अच्छा बनाया है। इसमें लाइट के जरिये अमीर आदमी के किरदार को सपनों-सा (surreal) बनाया जा सकता है।

हाँ, नमक के संगीत के लिए कुछ अलग तरह की धुन का प्रयोग किया जा सकता है। अभी वाली धुन अच्छी है पर सुनी-सुनाई सी लग रही है।

आशा है जिन्हें नाज़ है नाटक के अगले मंचन में यह कहानियाँ और उसे सुनाते इसके किरदार और निखर आएंगे।

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